
भारत का संविधान समानता, न्याय और गरिमा की बात करता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि आज भी देश के बड़े हिस्से में दलित और आदिवासी समुदायों को जातिगत भेदभाव, हिंसा और अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि SC/ST एक्ट इतना सख्त क्यों है? या फिर क्या इस कानून की आज भी ज़रूरत है?इस सवाल का जवाब सिर्फ कानून की किताबों में नहीं, बल्कि समाज की हकीकत में छिपा है।
SC/ST एक्ट क्या है?
SC/ST एक्ट का पूरा नाम Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 है।यह कानून अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनाया गया।
इस कानून के तहत जिन अपराधों को शामिल किया गया है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
1:- जातिसूचक गालियाँ देना
2:- सार्वजनिक रूप से अपमानित करना
3:- सामाजिक बहिष्कार
4:- ज़मीन या संपत्ति से जबरन बेदखल करना
5:- यौन हिंसा
6:- आर्थिक और सामाजिक शोषण
यह कानून इसलिए अलग है क्योंकि यह सिर्फ अपराध को सज़ा देने की बात नहीं करता, बल्कि पीड़ित की सुरक्षा और सम्मान को केंद्र में रखता है।
SC/ST एक्ट की ज़रूरत क्यों पड़ी?
संविधान लागू होने के बाद यह उम्मीद की गई थी कि जातिगत भेदभाव धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि आज़ादी के दशकों बाद भी दलित-आदिवासी समुदायों पर अत्याचार जारी रहे।
सामान्य IPC (भारतीय दंड संहिता) के तहत:
पुलिस अक्सर FIR दर्ज नहीं करती थी
दबंग आरोपियों के सामने पीड़ित डर जाते थे
प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही होती थी
1970 और 1980 के दशक में आई कई सरकारी रिपोर्ट्स और सामाजिक आंदोलनों ने यह साफ़ कर दिया कि बिना विशेष कानून के दलित-आदिवासियों को न्याय मिलना लगभग नामुमकिन है।इसी पृष्ठभूमि में 1989 में SC/ST एक्ट लाया गया।
SC/ST एक्ट और भारतीय संविधान
SC/ST एक्ट सीधे तौर पर संविधान की आत्मा से जुड़ा हुआ है।संविधान के कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेद इस कानून की नींव हैं:
अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता
अनुच्छेद 15: धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध
अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत
अनुच्छेद 46: SC/ST वर्गों के सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा
इसलिए SC/ST एक्ट कोई “विशेष सुविधा” नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।
SC/ST एक्ट में क्या खास प्रावधान हैं?
कैलाश पासवान ने हेमंत झा का मकान 2015 में बनाया था। 10 साल हो गए लेकिन 2.5 लाख रुपया मजदूरी का नही दिया।
— Vikas Kumar Jatav (@vkjatav84) February 5, 2026
कई बार पंचायत हो चुकी है।।
जब मांगने लगया तब हेमंत झा से नौकझोक हुई। इसके बाद हेमंत झा ने अपनी ईगो को ठेस मानकर अन्य लोगो को लेकर पासवान परिवार पर हमला कर दिया। महिलाओ,… pic.twitter.com/v9IR9g58Y6
SC/ST एक्ट को अक्सर “सख्त कानून” कहा जाता है। इसके पीछे कारण हैं:
शिकायत मिलने पर तुरंत FIR दर्ज करना
अग्रिम ज़मानत पर रोक, ताकि दबंग आरोपी पीड़ित को धमका न सकें
विशेष अदालतों का गठनपीड़ित को मुआवज़ा और पुनर्वास
लापरवाही बरतने वाले सरकारी अधिकारियों पर कार्रवाई
ये प्रावधान इसलिए रखे गए क्योंकि सामान्य कानूनों के तहत पीड़ित अक्सर न्याय तक पहुँच ही नहीं पाते थे।
“SC/ST एक्ट का गलत इस्तेमाल” — सच क्या है?
SC/ST एक्ट के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप “गलत इस्तेमाल” का लगाया जाता है।लेकिन जब हम तथ्यों को देखते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही सामने आती है।
NCRB (National Crime Records Bureau) के आंकड़े बताते हैं कि झूठे मामलों का प्रतिशत बहुत कम है। इसके मुकाबले बड़ी संख्या में ऐसे मामले हैं,जहाँ FIR ही दर्ज नहीं की जाती। कई पीड़ित सामाजिक दबाव और डर के कारण शिकायत तक नहीं करते।
मीडिया और सोशल मीडिया अक्सर कुछ चुनिंदा मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, जिससे यह भ्रम पैदा होता है कि कानून का दुरुपयोग बहुत ज़्यादा है, जबकि ज़मीनी हकीकत इससे उलट है।
SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Subhash Kashinath Mahajan केस में SC/ST एक्ट के कुछ प्रावधानों को नरम करने की कोशिश की।इस फैसले के बाद पूरे देश में दलित-आदिवासी समुदायों ने विरोध प्रदर्शन किया।
इसके बाद:
सरकार ने संसद के ज़रिए कानून में संशोधन किया।
अग्रिम ज़मानत पर रोक फिर से लागू हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि पीड़ितों की सुरक्षा सर्वोपरि है।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि SC/ST एक्ट सिर्फ कानून नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का सवाल है।
आज के भारत में SC/ST एक्ट क्यों ज़रूरी है?
अगर आज भी यह सवाल उठता है कि SC/ST एक्ट की ज़रूरत क्यों है, तो हमें ज़मीनी हकीकत देखनी चाहिए:
हाथरस, ऊना, सहारनपुर देश के सैकड़ों ग्रामीण इलाकों के मामले आज भी दलितों को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है
आदिवासियों की ज़मीन छीनी जाती है
शिकायत करने पर पीड़ित को धमकाया जाता है
ऐसे में यह कहना कि “अब सब बराबर हैं”, एक खतरनाक भ्रम है।
निष्कर्ष: SC/ST एक्ट कोई विशेषाधिकार नहीं, सुरक्षा है
SC/ST एक्ट को “हथियार” कहना आसान है,लेकिन सच्चाई यह है कि यह कानून एक ढाल है —उन लोगों के लिए, जिनके पास न सत्ता है, न ताकत।अगर कहीं कानून का दुरुपयोग होता है,तो समाधान कानून को खत्म करना नहीं,बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना है।